पहले देर रात तक जग कर लिख़ता-पढ़ता था। बीते महीने पता चला इसकी कीमत चुकाने का समय आ गया है। मधुमेह और उच्च रक्तचाप--- बहरहाल, ‘पाखी’ का जनवरी अंक मिला और फिलहाल मात्र तीन चीजें पढ़ सका हूं पर जरूरी लगा बताना कि पत्रिका बिल्कुल सही राह पर चल रही है।आपके मौजूं संपादकीय की अगली कड़ी है अग्रज सुधीश पचौरी जी की बहस और बातें। साहित्य में मेरी तरह देर से आने वालों के लिए यह सूचनापरक ....
