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एक बच्चे का किनकता मन अधूरा है,
मां के आंचल के बिना बचपन अधूरा है।
जो दि सकता नहीं छवि आपकी पूरी,
मैं समझता हूं कि वो दर्पन अधूरा है।
इक जरा-सी बात पर उठने लगी दीवार,
हो गया दो फांक हो आंगन, अधूरा है।
पेट की हो....
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हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं की भीड़ में अलग पहचान बनाने वाली 'पाखी' का प्रकाशन सितंबर, 2008 से नियमित जारी है।