वह `दूसरी’ पहाड़ चेतना
`किन्ने मूढ़ ने पानी नदी पहाड़ी दे
नमीयां बिनां चटानां एथे तिड़दिया
क्यु एने काहले उधर वहन्दे जांद ओ
बिना तुहाड़े जित्ते लहरां मचलदिया ?
खिच्चया जानैं तू तां उधर ही सदा
जिधर कोई नैन ना तेरी राह तक्के दिया !’
रसूल हमजातोव : अनुवाद फैज अहमद फैज
वर्षों (संभवतः 25 वर्ष) पहले `हिंदी कथाकारों की प....
