साहित्य, समानधर्मा कलाओं के साथ, सभ्यता का दस्तावेज़ तो है ही, वह सभ्यता की अंतर्यात्रा भी है और उसका पुनर्परीक्षण भी. ईमानदार सर्जक अपनी इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए कई तरह की युक्तियों का सहारा लेता है. कभी बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में, कभी प्रतीकात्मक, कभी रहस्यवादी तो कभी दुरुह फैंटेसी के माध्यम से वह अपने समय का दस्तावेज़ीकरण करता है, साथ ही पूर्व की स्मृतियों या भविष्....
