तुम आओगे या
मैं आ जाऊं
कि, अब तो पतझड़ के बाद की
नंगी शाखाओं पर
नए पत्ते आ चुके हैं और
प्रकृति भी अपने
पुराने लिबास उतार कर
नए आवरण में इठला रही है
दिन लंबे और उदासी भरे हो गए हैं
बहुत सारी उदासी
इकट्ठी हो गई है मेरे आस-पास
डरने लगी हूं उदासी के इन थपेड़ों से
आओ कि,अब तो
आषाढ़ की क्षणिक दशा में&n....
