पिछली किश्त के आखिर में हमने उस उत्तर आधुनिकतावादी ‘सांस्कृतिक वातावरण’ ने हमारे रोजमर्रा के अनुभवों व रचनात्मक अनुभवों की प्रक्रियाओं में बडे परिवर्तन पैदा कर दिए हैं-
इस सांस्कृतिक वातावरण में ‘मुख्यधारा का मीडिया’ व समकालीन ‘सोशल मीडिया’ और उपभोक्तावादी संस्कृति उद्योग की वस्तुओं (पण्यों )को वितरित करने वाला बाजार निर्णायक भूमिका निभाता है-<....
