मैंने इस सीरीज़ में पहले कहीं लिखा है कि जब मैं 1986 में आबूधाबी पहुंचा तब वहाँ के अखबारों में अपराध से जुड़ी घटनाएँ न के बराबर ही दिखती थीं । दुबई या अन्य इमारात के इक्का-दुक्का मामले कभी-कभार छप भी जाते मगर आबूधाबी की आपराधिक खबरें नहीं छपती थीं । सरकार की कोई सेंसर नीति थी या नहीं , बताना कठिन है । शायद थी । राजतंत्र में ऐसी नीतियाँ महलों के बाहर नहीं आतीं । महल....
