डाॅ. रसाल सिंह

साहित्य और संगीत के बीच पुल थे मंगलेश डबराल

मंगलेश डबराल के यहाँ आया विस्थापन का दर्द दरअसल उनकी मजबूरी का ही प्रतिफलन था जिसे उन्होंने सृजनात्मकता के धागे में पिरो दिया। ऐसा लगता है कि कवि अपनी उस स्मृति, उस पीड़ा को अपनी कविताओं में दर्ज करके अपने मन का बोझ हल्का कर रहा है। इस विषय पर समकालीन कवि और आलोचक पंकज चतुर्वेदी का कथन उचित जान पड़ता है– "एक स्तर पर उनकी समूची काव्ययात्रा 'विस्थापन के अर्थ....

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