संजीव

यह दुनिया अब भी सुंदर है

छींजते चांद की जर्द रोशनी फूस और नारियल के  जीर्ण-शीर्ण झोपड़ों में कोई रंग नहीं भर पायी थी अभी। फिर भी चेन्नई के इस नेटटकपम गांव में थोड़ी हलचल जाग गई थी।
सर्वग्रासी कोरोनाकाल की इस रात का शेष पहर था यह। अपने पंजों में मुंह दबाकर बैठे कुत्तों ने माहौल की अस्वाभाविकता को अचरज से सूंघा और आंकने की कोशिश की। पहले दो-चार जन निकले, फिर उनकी संख्या बढ़ते-बढ़ते सात हो गई।
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