पिताजी को शिलाजीत अतिप्रिय थी और माताजी का मन सिलबट्टा पर पिसी अमिया की चटनी में अटका रहता। इस तरह इन दोनों के साझा उद्यम से बालक शिलाव्रत शुक्ल का जन्म हुआ।
शिला से उनका निश्चित ही कोई पारलौकिक संबंध था। यह बात तो मां के पेट से ही तय हो गई थी। जब वे गर्भ में थे, तो छह महीने बीतने के बाद भी मां को कोई हलचल महसूस नहीं हुई। इस पर दादी को संदेह हुआ कि बहू का पेट गर्भ ....
