जेल के बाहर जेल
जेल के अंदर भी
और फिर उसके अंदर
एक और जेल
जो बाहर है, वह नहीं जानता
कि वह जेल में है
जो अंदर है, वह सोचता है
सिर्फ यही एक जेल है
पूरी जिंदगी ही दरअसल एक जेल है
जेल की औरत- 1
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हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं की भीड़ में अलग पहचान बनाने वाली 'पाखी' का प्रकाशन सितंबर, 2008 से नियमित जारी है।